होने लगा जमीर भी अब तो हलाल है
लोगों की भूख का ये अलम है ,ये हाल है

कीमत की बात कीजिये, मर्ज़ी बताइये
अब झूठ को भी सत्य बनाता दलाल है

मजहब की साजिशों में भी,शामिल है मुहब्बत
अब हुस्न हो कि इश्क हो, दोनों बवाल है

जो दो टके के थे नहीं, लाखों के हो गए
ये कुछ नहीं, सियासतों का बस कमाल है

जिसने शिकायतें किया, बर्खास्त हो गया
रिश्वत लिया , था शख्स जो वह तो बहाल है

तहज़ीब खो जवाब की, अब “बेजुबाँ” गई
हर इक सवाल के लिए भी इक सवाल है

जब तक जुदा जुदा हैं ,कोई भी डरायेगा
आओ ,मिला लो हाथ,तो किसकी मजाल है?

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