सौम्य-शिखर प्रकाश का
नित-नित दुर्गम्य होय,

चहुपाटी चहु दिशाओ में
नैतिकता बैठकर रोय,

पतन होय स्व-मूल्यों का
मूल्य अपर चुकाए ,

क्षणिक विरल संतुष्टि को
कोई निरा पतित हो जाय,

गरिमा लक्ष्मण रेखा की
धूमिल, क्षीण हुई- हे राम!

हत्या, चोरी, बलात्कार
दानव बन गया नीतिनिधान।।

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