कविता

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कागज़ के टुकड़ों से प्यार हो गया छंद ,काव्य सृजन अपार हो गया संभाल कर रखता हूँ इन्हें सर्वदा क्योंकि ये ही मेरा संसार हो गया सुख दुख की बातें लिखता रहा राष्ट्र जागरण का विचार हो गया दिल की धकधक हो या नई बात लिखा श्रृंगार तो   असर हो गया कवि राजेश पुरोहित
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पढ़कर याद रह जाने वाली किताब- पेपलौ चमार: समीक्षक- राजीव कुमार स्वामी

पढ़कर याद रह जाने वाली किताब- पेपलौ चमार: समीक्षक- राजीव कुमार स्वामी

पुस्तक कोना
एकता प्रकाशन चूरू से प्रकाशित शिक्षक, कवि उम्मेद गोठवाल की राजस्थानी में कविता की पहली ही किताब ’पेपलौ चमार’ दलित जीवन के यातनापूर्ण इतिहास और वर्तमान का दस्तावेज़ी बयान है। दलित विमर्श हिंदी में अब एक स्थापित विषय के रूप में जगह पा चुका है, बावज़ूद इसके दलित जीवन-संघर्ष और शोषण चक्र को इस तरह इतिहास, वर्तमान, राजनीति और धर्म के अनेक कोनों से देखने दिखाने वाली कविता की कोई ऐसी किताब शायद अभी तक हिंदी में भी नहीं है। राजस्थानी में प्रकाशित यह किताब न केवल अपने विषय को व्यापकता प्रदान करती है बल्कि दलित और अछूत कहे जाते रहे समाज की मुक्ति के संघर्ष में एक प्रभावी आवाज़ भी जोड़ती है। जाति आधारित शोषण की विद्रूपताओं को उद्घाटित करती पैनी और मार्मिक कविताओं से भरी यह किताब राजस्थानी…
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नवारुण प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तकें: संजय जोशी

नवारुण प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तकें: संजय जोशी

पुस्तक कोना
[gallery type="slideshow" size="large" ids="253,254,255,256,257,258"] 'ढाई साल में आठ किताबें ' 2015 में जब नवारुण की कल्पना साकार होना शुरू हुई थी तब हमे सबसे ज्यादा भरोसा चित्रकार लेखक और सीनियर साथी अशोक दा उर्फ़ अशोक भौमिक ने दिलाया था . साइज़ क्या रहेगा ,कागज़ कैसा लगाना है कीमत कितनी रखनी है लेखकों का मान कैसे रखना है यह सब अशोक दा ने बारीकी से समझाया. कई गलतियाँ हुई लेकिन एक -एक करके किताबें आती गयीं और 1000 प्रतियों के संस्करण भी जल्दी -जल्दी ख़त्म होने शुरू हुए . आज यह बताते हुए ख़ुशी हो रही है कि नवारुण में इस समय संस्मरण, सिनेमा , विज्ञान, कविता, दलित अध्ययन, दस्तावेज़, आत्मकथा, चित्रकला जैसी विविध विधाओं की कम से कम 20 पांडुलिपियों पर काम हो रहा है. इस साल के अंत तक…
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