फुदक-फुदक कर गीत सुनाती ,
कोयल जब बगिया में आती ।
हरी-भरी बगिया को वह तो ,
अपनें गीतों से महकाती ।।1।।

श्यामा-बुलबुल, तितली-भौंरे ,
नित दिन बगिया में आ जाते ।
कोयल के संग बड़े मजे से ,
मिल-जुल अपना रंग जमाते ।।2।।

और झिंगुर की सुन शहनाई ,
नाच रही है मैना रानी ।
प्रेम-भाव से रहना सीखो ,
सुना रही है हमें कहानी ।।3।।

✍डॉ.प्रमोद सोनवानी पुष्प
श्री फूलेंद्र साहित्य निकेतन
तमनार/पड़िगाँव-रायगढ़(छ.ग.)

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