ऋतु राज का आया मौसम ।।

उड़-उड़कर तितली रानी ,
झूम रही डाली – डाली ।
बन गई है धरती दुल्हन ,
अमराई में चलो चलें हम ।।1।।

खूब सजे हैं वन-उपवन ,
महक रहे हैं फूलों के गंध ।
कोयल रानी कू-कू करके ,
मिटा रही है सबका गम ।।2।।

लदे बौर से बगिया सारी ,
इसीलिए है लगती प्यारी ।
इतरायी बुल-बुल रानी ,
नाच रही वह छम-छमा-छम ।।3।।

डॉ.प्रमोद सोनवानी “पुष्प”
“श्री फूलेंद्र साहित्य निकेतन”
तमनार/पड़िगाँव-रायगढ़
(छ.ग.)भारत, 496107

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