महाजनी सभ्यता: मुंशी प्रेमचंद [दस्तावेज]

महाजनी सभ्यता: मुंशी प्रेमचंद [दस्तावेज]

आलोचना
(इस लेख में मुंशी प्रेमचंद ने पूंजीवादी व्यवस्था (महाजनी सभ्यता) द्वारा अनिवार्य रूप से पैदा होने वाली व्यक्तिगत स्वार्थ, कपट, लोभ-लालच, बेरोज़गारी, वेश्यावृत्ति, भ्रष्टाचार आदि समस्याओं पर चर्चा की है. साथ ही रूसी क्रांति के बाद वहाँ  की बेहतरीन सामाजिक संरचना की एक झलक भी प्रस्तुत की है.) महाजनी सभ्यता मुज़द: ए दिल कि मसीहा नफ़से मी आयद; कि जे़ अनफ़ास खुशश बूए कसे मी आयद। ( ह्रदय तू प्रसन्न हो कि पीयूषपाणि मसीहा सशरीर तेरी ओर आ रहा है। देखता नहीं कि लोगों की साँसों से किसी की सुगन्धि आ रही है।) जागीरदारी सभ्यता में बलवान भुजाएँ और मजबूत कलेजा जीवन की आवश्यकताओें में परिगणित थे, और साम्राज्यवाद में बुद्धि और वाणी के गुण तथा मूक आज्ञापालन उसके आवश्यक साधन थे। पर उन दोनों स्थितियों में दोषों के साथ कुछ गुण भी थे। मनुष्य के अच्छे…
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न्यूज़ीलैंड की हिंदी पत्रकारिता- रोहित कुमार ‘हैप्पी’

न्यूज़ीलैंड की हिंदी पत्रकारिता- रोहित कुमार ‘हैप्पी’

पत्रिकाएँ
  न्यूज़ीलैंड की लगभग 46 लाख की जनसंख्या में फीजी भारतीयों सहित भारतीयों की कुल संख्या डेढ लाख से अधिक है। 2013 की जनगणना के अनुसार हिंदी न्यूज़ीलैंड में सर्वाधिक बोले जाने वाली भाषाओं में चौथे नम्बर पर है। यूँ तो न्यूजीलैंड में अनेक पत्र-पत्रिकाएँ समय-समय पर प्रकाशित होती रही हैं सबसे पहला प्रकाशित पत्र था 'आर्योदय' जिसके संपादक थे श्री जे के नातली, उप संपादक थे श्री पी वी पटेल व प्रकाशक थे श्री रणछोड़ क़े पटेल। भारतीयों का यह पहला पत्र 1921 में प्रकाशित हुआ था परन्तु यह जल्दी ही बंद हो गया। एक बार फिर 1935 में 'उदय' नामक पत्रिका श्री प्रभु पटेल के संपादन में आरम्भ हुई जिसका सह-संपादन किया था कुशल मधु ने। पहले पत्र की भांति इस पत्रिका को भी भारतीय समाज का अधिक…
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हिंदी के प्रवासी साहित्य की परम्परा: स्वर्णलता ठन्ना

हिंदी के प्रवासी साहित्य की परम्परा: स्वर्णलता ठन्ना

आलेख
  साहित्य के विशाल वटवृक्ष की अनेक समृद्ध और सशक्त शाखाओं में से एक शाखा प्रवासी साहित्य की भी है। जो दिन-प्रतिदिन अपनी रचनाधर्मिता से हिंदी के साहित्य को सघन बनाने के साथ-साथ पाठक वर्ग को प्रवास की संस्कृति, संस्कार एवं उस भूभाग से जुड़े लोगों की स्थिति से अवगत कराने का कार्य कर रही है। ‘प्रवासी हिंदी साहित्य’ हिंदी साहित्य में जुड़ती एक नवीन विधा एवं चेतना है जो प्रवासियों के मनोविज्ञान से जुड़ी है, जो न केवल एक नई विचारधारा है बल्कि एक नई अंतर्दृष्टि भी है, जिसे अपनी जगह बनाने में पर्याप्त समय लगा है। प्रवासी साहित्य की परम्परा बहुत पुरानी नहीं है, किंतु फिर भी प्रवासी साहित्य अपनी संवेदनात्मक रचनाधर्मिता से साहित्य के क्षेत्र में गहरी जड़े जमा चुका है। भारत से दूर अन्य देशों में…
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पीडीऍफ़ को  वर्ड में कैसे बदलें जानिये हिंदी में

पीडीऍफ़ को वर्ड में कैसे बदलें जानिये हिंदी में

हिंदी टेक
पीडीऍफ़ को वर्ड में कैसे बदलें जानिये हिंदी में कई बार हमको इन्टरनेट पर लेख इत्यादि पीडीऍफ़ में मिलते हैं ऐसे में यदि आप इसे वर्ड फाईल में बदलना चाहें तो कैसे बदलेंगे वह भी बिना किसी सॉफ्टवेयर के. आइये जानते हैं हिंदी में एसआरके टेक्नीकल द्वारा. वीडियो के साथ चैनल को सब्सक्राईब अवश्य करें ताकि यह जानकारी आपको मिलती रहे- वीडियो देखें- https://youtu.be/lvolc0zLoNk सब्सक्राईब करने के लिए- https://www.youtube.com/channel/UCoJ0L3nfEtjd8MA-MdhrnxQ
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आचार्य रामचंद्र शुक्ल और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के संदर्भ में नामवर सिंह और रामस्वरुप चतुर्वेदी द्वारा ‘दूसरी परंपरा की खोज’ का मूल्यांकन- अनामिका दास

आचार्य रामचंद्र शुक्ल और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के संदर्भ में नामवर सिंह और रामस्वरुप चतुर्वेदी द्वारा ‘दूसरी परंपरा की खोज’ का मूल्यांकन- अनामिका दास

आलेख
  हिंदी के साहित्य और साहित्यकार की चर्चा करना और एक मूल और तटस्थ निष्कर्ष तक पहुँचना, कई मामलों में ठीक उसी प्रकार है जैसे एक समुद्र से मोती ढूंढ कर निकालना| कई पड़ावों पर आकर हमें ऐसा लगने लगता है मानो अब हम लक्ष्य के बहुत करीब हैं मगर खंगालने पर मालूम होता है कि अभी भी कई ऐसे पहलू हैं जिन्हें पढ़ना और जिन-पर शोध करना अत्यंत ही आवश्यक है| हिंदी साहित्य का इतिहास पढ़ते हुए मैंने मुख्य रूप से दो आचार्यों का अध्ययन किया और उन्हें जानने अथवा समझने का प्रयास किया| वे दो आचार्य हैं - आचार्य रामचंद्र शुक्ल और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी दोनों ही साहित्यकार हिंदी साहित्य के प्रमुख बिंदु या यूँ कहें आधार बिंदु हैं| कई विद्वानों द्वारा इन्हें हिंदी साहित्य का स्तम्भ भी…
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समकालीन महिला काव्य-लेखन, स्त्री छवि: मिथक ऒर यथार्थ- दिविक रमेश

समकालीन महिला काव्य-लेखन, स्त्री छवि: मिथक ऒर यथार्थ- दिविक रमेश

आलोचना
  यद्यपि शीर्षक में आए  शब्द अर्थात ’स्त्री छवि’, मिथक’ ऒर ’यथार्थ’ अपने नये से नये अर्थ में विचारणीय हॆं तो भी यह मानते हुए कि अधिकतर उस अर्थ से अनजान नहीं हॆं, अपनी बात रखना चाहूंगा । प्रारम्भ में ही यदि पद्मा सचदेव के हवाले (सबद मिलावा, पृ० 212)  से कहा जाए तो यह जानना भी दिलचस्प होगा कि कविता के क्षेत्र में महिला लेखन पुरुष लेखन की अपेक्षा कम हॆ।  उनके अनुसार,"लड़की कवयित्री हो तो लोग प्रशंसा की नज़र से देखते हॆं । आज तो मॆदान में कवयित्रियां आनी चाहिए । कहानी में जितनी स्त्रियां गतिशील हॆं उतनी कविता में नहीं हॆं ।"कुछ ऎसा ही मत श्रीमती धर्मा यादव ने अपने लेख स्त्री विमर्श ऒर हिन्दी स्त्री लेखन में व्यक्त किया हॆ-"कविता में व्यक्त संवेदना की अपेक्षा स्त्री चेतना की कथा साहित्य में व्यापकता मिलती हॆ ।"(streevimarsh.bolgspot.com) । इसी लेख में उन्होंने नारी मुक्ति के संघर्ष के इतिहास…
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आत्मकथा : हिंदी साहित्य लेखन की गद्य विधा- डॉ. प्रमोद पाण्डेय

आत्मकथा : हिंदी साहित्य लेखन की गद्य विधा- डॉ. प्रमोद पाण्डेय

आलेख
  आत्मकथा हिंदी साहित्य लेखन की गद्य विधाओं में से एक है। आत्मकथा यह व्यक्ति के द्वारा अनुभव किए गए जीवन के सत्य तथा यथार्थ का चित्रण है। आत्मकथा के केंद्र में आत्मकथाकार या किसी भी व्यक्ति विशेष के जीवन के विविध पहलुओं तथा क्रिया-कलापों का विवरण होता है। आत्मकथा का हर एक भाग मानव की जिजीविषा तथा हर एक शब्द मनुष्य के कर्म व क्रिया-कलापों से जुड़ा हुआ होता है। "न मानुषात् श्रेष्ठतर हि किंचित्" अर्थात मनुष्य से बढ़कर कुछ भी नहीं है। आत्मकथा के अंतर्गत आत्मनिरीक्षण, आत्मपरीक्षण, आत्मविश्लेषण, आत्माभिव्यक्ति यह आत्मकथा के द्वारा की जाती है। आत्मकथा के अंतर्गत सत्यता का विशेष महत्व होता है। यदि आत्मकथा में सत्यता नहीं होगी तो वह आत्मकथा उत्कृष्ट नहीं माना जाता है। आत्मकथा के अंतर्गत व्यक्तिगत जीवन के विविध पहलुओं, जो कि आत्मकथाकार ने स्वयं भोगा…
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स्त्री विमर्श: हिन्दी साहित्य के संदर्भ में- नेहा गोस्वामी

स्त्री विमर्श: हिन्दी साहित्य के संदर्भ में- नेहा गोस्वामी

आलेख
  प्राचीन भारतीय वाङमय से लेकर आज तक स्त्री विमर्श किसी न किसी रूप में विचारणीय विषय रहा है। “आज से लगभग सवा सौ साल पहले का श्रद्धाराम फिल्लौरी का उपन्यास ‘भाग्यवती’ से लेकर आज तक स्त्री विमर्श ने आगे कदम बढ़ाया ही है, छलांग भले ही न लगायी हो।  अलग-अलग पैमानों पर ही सही, प्रगति हुई है। कैसी प्रगति? केवल सजावटी, बनावटी, दिखावटी या सचमुच की?”(विनय कुमार पाठक, 2009) यह सर्वविदित है कि साहित्य समाज का दर्पण है। किसी भी रचनाकार की रचना में अपने समय काल, उस समय के प्रचलन सिंद्धांतों का समावेश होता है। साहित्य समाज के यथार्थ का बोध कराता है। उपन्यास के माध्यम से रचनाकार अपने युग तथा विशिष्ट काल खंड को विभिन्न चरित्रों, घटनाओं आदि के सयोंजन द्वारा उनकी वास्तविक परिस्थितियों में समग्रता के साथ अभिव्यक्त करता है जिसमें वैयक्तिक अनुभव अपनी समाजिकता के साथ…
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” ऋतुराज का मौसम “

” ऋतुराज का मौसम “

कविता
ऋतु राज का आया मौसम ।। उड़-उड़कर तितली रानी , झूम रही डाली - डाली । बन गई है धरती दुल्हन , अमराई में चलो चलें हम ।।1।। खूब सजे हैं वन-उपवन , महक रहे हैं फूलों के गंध । कोयल रानी कू-कू करके , मिटा रही है सबका गम ।।2।। लदे बौर से बगिया सारी , इसीलिए है लगती प्यारी । इतरायी बुल-बुल रानी , नाच रही वह छम-छमा-छम ।।3।। डॉ.प्रमोद सोनवानी "पुष्प" "श्री फूलेंद्र साहित्य निकेतन" तमनार/पड़िगाँव-रायगढ़ (छ.ग.)भारत, 496107
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” सुना रही है हमें कहानी “

” सुना रही है हमें कहानी “

कविता
फुदक-फुदक कर गीत सुनाती , कोयल जब बगिया में आती । हरी-भरी बगिया को वह तो , अपनें गीतों से महकाती ।।1।। श्यामा-बुलबुल, तितली-भौंरे , नित दिन बगिया में आ जाते । कोयल के संग बड़े मजे से , मिल-जुल अपना रंग जमाते ।।2।। और झिंगुर की सुन शहनाई , नाच रही है मैना रानी । प्रेम-भाव से रहना सीखो , सुना रही है हमें कहानी ।।3।। ✍डॉ.प्रमोद सोनवानी पुष्प श्री फूलेंद्र साहित्य निकेतन तमनार/पड़िगाँव-रायगढ़(छ.ग.)
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शांत

शांत

कविता
 १ -अगर  तुम्हे बहुत दुःख हो तब         जाओ यहाँ से दूर         बसंत में शहर छोड़ गाँव  की         तरफ निकल जाओ        वहां सरसो  के  पीले  भरे  खेतों  में        जाकर बीचो -बीच खड़े हो        और पुरवैया की हल्के -२        झोंकों  को  महसूस  करो        एक पल शरीर को ढीला छोड़ दो        एक  लम्बी सांस लो        एक बार उन फूलों से        अपने दुःख बयां करो        और फिर तेज़ से        अपने प्रिय को बुलाओ        तुम्हे एक अलग शांति महसूस होगी , २ - अगर नहीं हुई  तो  फिर       अपने आँखों को  ढीला छोड़ दो   …
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” बिटिया ”

” बिटिया ”

कविता
                             '' बिटिया ''                                  मैं  जन्मी माँ के आँगन में खुशियों का पैगाम लिए सुन्दर नन्हें हाथों में थामे बाबू जी के अरमान लिए मैं जन्मी माँ के आँगन में।।१।।             जन्म हुआ मेरा मैं  खुश थी  मन में इक  विश्वास लिए प्यार मिलेगा माँ - बाबू का बड़े भाई का स्नेह लिए मैं  जन्मी  माँ के आँगन में।। २।।            बचपन  में माँ का प्रेम मिला  बाबू जी खातिर तरस गई लेकिन भैया का प्रेम मिला तो अखियाँ जैसे बरस गई मैं  जन्मी माँ के आँगन में।।३।।           नन्हें…
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